करन वन्दना अधिक पैदावार के साथ ब्लास्ट बीमारी से भी लड़ने में सक्षम

बिना रोटी, चपाती या परांठे के उत्तर भारतीयों का भोजन अधूरा है। गेहूं की मांग हमारे देश में बहुत अधिक है और अच्छी बात यह है कि इसके उत्पादन में देश आत्मनिर्भर है। उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और बिहार में गेहूं की खेती सबसे ज््यादा की जाती है। कृषि वैज्ञानिक गेहूं की पैदावार बढ़ाने के लिए लगातार नई और उन्न्त किस्मों का विकास करते रहते हैं। ऐसी ही एक किस्म है करण वंदना जिसे डीबीडब्ल्यू 187 भी कहा जाता है।

बदलते हुए वक्त के साथ कृषि क्षेत्र में नए-नए शोध जारी हैं। इसी क्रम में करनाल में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने गेहूं की एक नई किस्म तैयार की है। इस गेंहू का नाम ‘करन वन्दना’ रखा गया है। माना जा रहा है कि ज्यादा उपज के साथ-साथ ये किसानों को अघिक मुनाफा देने में भी सहायक होगी। वहीं इसकी खेती में किसानों को पहले की अपेक्षा श्रम की आवश्यक्ता कम पड़ेगी।
बता दें कि गेहूं की इस किस्म को उत्तर-पूर्वी राज्यों में आसानी से खेती के लिए प्रयोग किया जा सकता है। ‘करन वन्दना’ अधिक पैदावार देने के साथ गेहूं ‘ब्लास्ट’ नामक बीमारी से भी लड़ने में सक्षम है। इसकी खेती के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों की मृदा एवं जलवायु उपयुक्त है। इस बारे में विशेषज्ञों ने बताया कि अन्य किस्में जहां औसत उपज 55 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर करती है, वहीं ‘करन वन्दना’ से 64.70 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर तक से अधिक की उपज करने में सक्षम है।

क्या है नई किस्म की खासियतः-

1- अन्य गेहूं की किस्मों की तुलना में इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक है।
2- इसके अलावा जैविक रूप से जस्ता, आयरन व अन्य खनिज भी इसमें मौजूद हैं।
3-गेहूं की यह नई किस्म अन्य किस्मों की तुलना में अधिक पैदावार देती है।
4- इसमें कई तरह की बीमारियों से लड़ने की क्षमता है जैसे पीला रतुआ और ब्लास्ट आदि।
5- इस किस्म का गेहूं बोने पर किसानों को फसल के खराब होने का डर भी कम रहेगा।
6- इसमें 43.1 पीपीएम लौह तत्व है, जिससे इस गेहूं से बनी रोटी खून की कमी को दूर करके एनीमिया रोग से बचाने में भी मददगार हो सकती है।

करण वंदना गेहूं की किस्म

करण वंदना यानी डीबीडब्ल्यू 187 गेहूं की नई किस्म पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, असम और पश्चिम बंगाल के उत्तर-पूर्वी मैदानी इलाकों में बुवाई के लिए बेहतरीन विकल्प है। बस इसमें सिंचाई का ध्यान रखने की जरूरत है। करण वंदना अधिक गर्म तापमान में भी अच्छी पैदावार देता है।

अन्य किस्मों से बेहतरीन

गेहूं की अन्य उन्नत किस्मों की तुलना में करण वंदना से गेहूं की पैदावार अधिक होती है। गेहूं की पूसा यशस्वी किस्म से 57.5 से 79.60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, करण श्रिया से प्रति हेक्टेयर अधिकतम पैदावार 55 क्विंटल और डीडीडब्ल्यू 47 किस्म से प्रति हेक्टेयर करीब 74 क्विंटल गेहूं का उत्पादन होता है, जबकि करण वंदना प्रति हेक्टेयर 75 से 82 क्विंटल तक पैदावार देने में सक्षम है। इतना ही नहीं, फसल 120 दिनों में पककर तैयार भी हो जाती है।

अधिक पौष्टिकः-

गेहूं की यह किस्म अन्य किस्मों से अधिक पौष्टिक मानी जा रही है। जानकारों के मुताबिक, सामान्य गेहूं में प्रोटीन की मात्रा 10 से 12 प्रतिशत होती है और आयरन 30 से 40 प्रतिशत, लेकिन करण वंदना में प्रोटीन 12 प्रतिशत से अधिक और आयरन 42 प्रतिशत से अधिक है। यानी इस गेहूं से बनी रोटी अधिक सेहतमंद है।

महत्वपूर्ण खनिज है मौजूदः

इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि ‘‘गेहूं की इस नई किस्म (‘करन वन्दना’-डीबीडब्ल्यू 187) रोगों से लड़ने में सक्षम होने के साथ-साथ मौसम की मार को झेल सकती है। इसके अलावा इसमे प्रोटीन, जस्ता, लोहा और कई अन्य तरह की महत्वपूर्ण खनिज भी मौजूद हैं। ये किस्म सरलता से ‘ब्लास्ट’ रोग से लड़ सकती है। इसके अलावा ये इस किस्म में बुवाई के बाद फसल की बालियां 77 दिनों में निकल जाती है।

भारत की अहम फसल है गेहूः

भारत के लिए गेहूं एक अहम एवं महत्वपूर्ण फसल है और एक बड़े भू भाग के विशाल खाद्य समस्याओं को सुलझाने में सहायक होती है। लेकिन गेहूं को सबसे अधिक कीटों से नुकसान होने की संभावना होती है। कीटों के कारण इसकी उत्पादन क्षमता कम होने या कभी-कभी तो पूरी तरह से चैपट हो जाती हैं।

करण वंदना किस्म की खेती का किसानों ने लिया भरपूर उत्पादन का लाभ

भारतीय गेहूं एवं जो अनुसंधान संस्थान करनाल ने महायोगी गोरखनाथ कृषि विज्ञान केंद्र गोरखपुर उत्तर प्रदेश के साथ मिलकर 16 नवंबर 2018 को एक गेहूं प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया था जिसमें 100 किसानों को इस प्रशिक्षण दिया था जिसमें ढाई किलो ग्राम बीजों की मिनी किट किसानों को बांटी गई थी उसके बाद किसानो को भरपूर उत्पादन का लाभ मिला था।

नोटः- अलग अलग क्षेत्र में सभी प्रकार की गेंहू भूमि की उपज क्षमता पर निर्भर करती है। भूमि उपजाऊ नहीं है तो गेहूं का उत्पादन कम होगा चाहे कोई भी वैरायटी का उपयोग करें। इसके साथ ही गेहूं के बीज वैरायटी का चयन जमीन के आधार पर करना चाहिए। इसके साथ ही अधिक उत्पादन लेने के लिए आवश्यकता अनुसार उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है। उम्मीद है आपको की जानकारी पसंद आयेगी यह जानकरी किसान के साथ साथ कृषि वैज्ञानिक से ली गई है। हमारा उदेश्य आपको एक अच्छी जानकारी उपलब्ध करना है उत्पादन कम या ज्यादा हो सकता है।